Saturday, 6 January 2018

polio vaccine (पोलियो वैक्सीन)

पोलियो वैक्सीन



पोलियो वैक्सीन
वक्सीन विवरण
Target diseasePolio virus
प्रकारKilled/Inactivated
परिचायक
दुनियाभर में पोलिओम्येलितिस (या पोलिओ) का मुकाबला करने के लिए दो पोलियो वैक्सीन का प्रयोग किया जाता है पहला जोनास सॉल्क द्वारा विकसित किया गया और 1952 में उसका पहला परीक्षण किया गया। 1955, अप्रैल 12 को सॉल्क द्वारा दुनिया को इसकी घोषणा की गयी की, यह निष्क्रिय (मरे हुए) पोलियोवायरस की इंजेक्शन की खुराक होते हैं . एक मौखिक टीका अल्बर्ट साबिन द्वारा तनु (कमजोर किये गए) पोलियो वायरस का उपयोग करके विकसित किया गया . साबिन के टिके का मानव परिक्षण १९५७ में शुरू किया गया और इसने १९६२ में लाइसेंस प्राप्त किया। चूँकि साधारणतः असंक्राम्य व्यक्तियों में पोलिओ वायरस की कोई दीर्घकालिक वाहक परिस्थिति नहीं है और, पोलियोवायरस का प्रकृति में कोई गैर रिहायशी भण्डारण नहीं है और पर्यावरण में इस वायरस का एक समय की विस्तारित अवधि के लिए अस्तित्व बनाये रखना मुश्किल है। इसलिए, टीकाकरण के द्वारा वायरस का व्यक्ति से व्यक्ति में संचरण की रोकधाम वैश्विक पोलियो उन्मूलन का एक महत्वपूर्ण कदम है। इन दो टीकों द्वारा दुनिया के सबसे अधिक देशों से पोलियो का उन्मूलन किया गया है और दुनियाभर में पोलियो के मामले, अनुमानित, १९८८ में ३५०,००० से घटकर २००७ में १,६५२ रह गए हैं।

विकास

सामान्य अर्थ में, टीकाकरण रोग प्रतिरोगी तंत्र को 'immunogen '(रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ने वाले तत्त्व) के द्वारा तैयार करता है। प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को, एक संक्रामक एजेंट के माध्यम से, उत्तेजित करने की प्रक्रिया को प्रतिरक्षण (immunization) के रूप में जाना जाता है। टीकाकरण द्वारा पोलियो के प्रति रोगक्षमता को विकसित करने से जंगली पोलियो वायरस का व्यक्ति से व्यक्ति संचरण कुशलतापूर्वक ब्लॉक हो जाता है, जिससे व्यक्तिगत टीका प्राप्तकर्ताओं और व्यापक समुदाय, दोनों की सुरक्षा होती है।
1936 में, मौरिस ब्रोदिए ने, जो की न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में एक अनुसंधान सहायक थे, एक मुलभुत बन्दर स्पिनल कार्ड से एक formaldehyde द्वारा मारे गए पोलियो टिके का निर्माण करने का प्रयास किया। उनके प्रारंभिक प्रयास पर्याप्त वायरस प्राप्त न कर पाने के कारण अवरुद्ध हुए. ब्रोदिए ने सबसे पहले उस टिके का परिक्षण अपने आप पर और अपने कई सहायकों पर किया। उसके बाद उन्होंने वह teeka तीन हज़ार बच्चो को दिया, जिनमे से कई बच्चो को प्रतिक्रियात्मक एलर्जी हुई, लेकिन किसी में भी पोलियो प्रतिरोधकता विकसित नहीं हुई. फिलाडेल्फिया के रोगविज्ञानी जॉन कोल्मेर ने भी उसी वर्ष एक teeka बनाने का दावा किया, लेकिन उससे भी प्रतिरोधकता उत्पन्न नहीं हुई और उन्हें कई मामले प्रवृत करने का दोषी ठहराया गया, जिनमे से कुछ जानलेवा थे।
एक सफलता 1948 में मिली जब जॉन एंडर्स की अध्यक्षता में एक शोध समूह ने बोस्टन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में मानव उतकों पर पोलियो वायरस सफलतापूर्वक उगा दिया. इस बढ़त ने वैक्सीन अनुसंधान में बहुत मदद की और अंततः पोलियो के खिलाफ टीके का विकास करना मुमकिन बना दिया . एंडर्स और उनके सहयोगियों, थॉमस एच. सी. वेलर और फ्रेडरिक रॉबिंस, द्वारा की गयी मेहनत को मान्यता देने के लिए उन्हें वर्ष १९५४ में फिजियोलॉजी या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया . पोलियो वायरस के विकास के अन्य महत्वपूर्ण अग्रगणि थे:तीन पोलियो वायरस (serotype) की पहचान (पोलियो वायरस प्रकार १ - PV1, या Mahoney ; PV2, Lansing और PV3, Leon); यह निष्कर्ष कि पक्षाघात से पहले वायरस का रक्त में मौजूद होना ज़रूरी है और यह स्पष्टीकरण कि एंटीबॉडी की खुराक गामा - ग्लोबुलिन के रूप में लेने से पक्षघती पोलियो से बचा जा सकता है।
जब 1952 और 1953 में, क्रमशः, 58,000 और 35,000 पोलियो के मामले सामने आये, अमेरिका में पोलियो का प्रकोप हुआ, जो की आम तौर पर कुछ 20000 प्रतिवर्ष की संख्या से काफी ज्यादा थे। अमेरिका की इस महामारी के बीच, वाणिज्यिक हितों के तहत पोलियो टीका खोजने और विपणन करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किये गए, जिनमे एच.आर. काक्स के निर्देशन में न्यू योर्क की लेदेरले प्रयोगशाला भी शामिल थी। इसके साथ ही लेदेरले में काम करने वाले पोलिश मूल के विषाणुविज्ञानी और प्रतिरक्षा विज्ञानी हिलेरी कोप्रोव्सकी ने पहला 
सफल पोलियो वैक्सीन बनाने का दावा किया। हालांकि उनका टिका, जो की मौखिक रूप से लिया जाने वाला एक जीवित तनु (कमजोर किया गया) विषाणु  था, अब भी अनुसंधान चरण में था और जोनास सॉल्क के पोलियो टीके (एक निर्जीव, इंजेक्शन से लिया जाने वाला वैक्सीन) के बाजार में आ जाने के पांच साल बाद इस्तेमाल के लिए तैयार हुआ था। कोप्रोव्सकी का तनु टीका सफ़ेद स्विस चूहों के मस्तिष्को के माध्यम में लगातार पारित कर के तैयार किया गया था। सातवें गमन तक, टिके द्वारा डाला गया असर इतना प्रभावशाली नहीं रह जाता की वो स्नायुतंत्र उतकों को संक्रमित कर सके या पक्षाघात का कारण बन सके. उसके बाद चूहों पर एक से तीन गमन और आगे करने के बाद इस वैक्सीन को मानव उपयोग के लिए सुरक्षित मान लिया गया। 27 फ़रवरी 1950, को कोप्रोव्सकी की जीवित, तनु वैक्सीन का पहली बार लेत्च्वोर्थ गाँव, न्यू योर्क के एक ८ साल के लड़के पर परिक्षण किया गया। लड़के पर कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ और कोप्रोव्सकी ने अपने प्रयोग का विस्तार करते हुए 19 अन्य बच्चों को शामिल कर लिया। 
दो पोलियो टीकों के विकास के मार्गदर्शन में पहले आधुनिक बहुसंख्यक टीकों तक पहुंचे . संयुक्त राज्य अमेरिका में जंगली वायरस के स्थानिक संचरण के कारण लकवाग्रस्त पोलिओम्येलितिस के प्रकोप के कुछ आखिरी मामले वर्ष 1979 में मिडवेस्ट के भिन्न राज्यों, जिनमे से अमिश भी एक था, में दर्ज किये गए . विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और रोटरी फाउंडेशन के नेतृत्व में १९८८ में पोलियो के उन्मूलन के लिए एक वैश्विक प्रयास शुरू किया गया, जो की मुख्या रूप से अल्बर्ट साबिन की मौखिक वैक्सीन पर निर्भर था। यह रोग अमेरिका से १९४४ में पूरी तरह मिटा दिया गया। 2000 में ऑस्ट्रेलिया और चीन सहित, ३६ पश्चिमी प्रशांत के देशों से पोलियो आधिकारिक तौर पर मिटा दिया गया था। यूरोप 2002 में पोलियो मुक्त घोषित किया गया . २००८ तक, पोलियो केवल इन चार देशो में स्थानिक रह गया : नाइजीरिया, भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान. हालांकि पोलियो वायरस संचरण दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में बाधित कर दिया गया है, किन्तु जंगली पोलियो वायरस का संचरण जारी है और पहले से पोलियो मुक्त क्षेत्रों में जंगली पोलियो वायरस के आयातित होने का निरंतर ख़तरा बना हुआ है। अगर पोलियोवायरस आयातित होता है तो, पोलियो का प्रकोप फ़ैल सकता है, खासतौर पर उन क्षेत्रो में जहाँ कम टीकाकरण कवरेज है और पर्याप्त स्वच्छता नहीं है। अतः, टीकाकरण कवरेज के उच्च स्तरों को बनाए रखा जाना चाहिए.

निष्क्रिय टीके

पहला प्रभावी पोलियो वैक्सीन पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय में 1952 में जोनास सॉल्क द्वारा विकसित किया गया था। लेकिन इसको वर्षो के परिक्षण की आवश्यकता थी। धैर्य बंधाने के लिए सॉल्क ने 26 मार्च 1953 को रेडियो सीबीएस पर वयस्कों और बच्चों के एक छोटे से समूह पर सफल परिक्षण किये जाने की घोषणा की, दो दिन बाद उस परिक्षण के नतीजे JAMA में प्रकाशित किये गए।
सॉल्क वैक्सीन, या निष्क्रिय पोलियोवायरस टीके (आइपीवी), तीन जंगली विषमय उपभेदों पर आधारित है, Mahoney (प्रकार 1 पोलियो वायरस), MEF-1 (प्रकार 2 पोलियो वायरस) और Saukett (प्रकार 3 पोलियो वायरस), जिन्हें बन्दर के गुर्दे के उतक समूह (वेरो सेल रेखा) के एक प्रकार में उगाया गया था और उसके बाद उन्हें फोर्मलिन से निष्क्रिय किया गया . इंजेक्शन सॉल्क वैक्सीन आईजीजी के माध्यम से रक्तप्रवाह में प्रतिरक्षा प्रदान करता है, जो की पोलियो के संक्रमण को बढ़कर विषाणुरक्तता में बदलने से रोकता है और मोटर नुरोंस की रक्षा करता है और इस प्रकार कंदाकार पोलियो एवं पोस्ट पोलियो सिंड्रोम के जोखिम को ख़त्म कर देता है।
1954 में इस वैक्सीन का Arsenal Elementary स्कूल और वाटसन होम फॉर चिल्ड्रेन पिट्सबर्ग, पेंसिल्वेनिया, में परीक्षण किया था। फिर सॉल्क के टीके का इस्तेमाल थोमस फ्रांसिस के नेतृत्व में Francis Field Trial नमक एक परिक्षण में किया गया जो की इतिहास का सबसे बड़ा चिकित्सा परिक्षण था। परीक्षण की शुरुआत कुछ ४००० बच्चों के साथ Franklin Sherman Elementary School, म्क्लेँ, वेर्जिनिया में की गयी जिसमे की आगे चलकर Maine से लेकर कैलिफोर्निया तक ४४ राज्यों के १८ लाख बच्चे शामिल होने थे। अध्ययन के ख़त्म होने तक, लगभग 440,000 बच्चों को एक या एक से अधिक टिके का इंजेक्शन दिया जा चुका था, २१०,००० बच्चो को प्लासेबो, जिसमे हानिरहित मीडिया समूह शामिल था, दिया जा चुका था, और 12 लाख बच्चे जिन्हें कोई भी टिका नहीं लगाया गया था, वे एक नियंत्रण समूह की भूमिका में थे, जिसका फिर निरिक्षण किया गया ये देखने के लिए की किसी को पोलियो हुआ है या नहीं. क्षेत्र परीक्षण के परिणामों की घोषणा 12 अप्रैल 1955 (फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट की मौत के दसवें सालगिरह ; देखिये, फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट की लकवे की बीमारी) को की गयी थी। सॉल्क वैक्सीन PV1 1 (प्रकार 1 पोलियो वायरस) के विरुद्ध 60 से ७०% कारगर है,PV2 और PV3 के विरुद्ध ९० प्रतिशत से ज्यादा कारगर है, और कंदाकार पोलियो के विकास के विरुद्ध ९४ प्रतिशत तक कारगर है। सॉल्क वैक्सीन को 1955 में लाइसेंस दिए जाने के बाद जल्द ही बच्चो का टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया गया। अमेरिका में,March of Dimes के द्वारा प्रचारित सामूहिक प्रतिरक्षण टीकाकरण अभियान का अनुसरण करते हुए, पोलियो के सालाना मामले १९५७ में ५६०० तक गिर गए। १९६१ तक संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल १६१ मामले दर्ज हुए .
नवंबर 1987 में, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक अधिक प्रबल आइपीवी को लाइसेंस दिया गया और वर्त्तमान में वह संयुक्त राज्य अमेरिका का चुनिन्दा विकल्प है। पोलियो टीके की पहली खुराक जन्म के बाद शीघ्र ही, आमतौर पर १ से २ महीने के उम्र के बीच और, एक दूसरी खुराक 4 महीने की उम्र में दी जाती है। तीसरी खुराक का समय टीका निरूपण पर निर्भर करता है, लेकिन यह ६ से १८ महीने की उम्र के बीच दे देना चाहिए. ४ से ६ साल की उम्र के बीच एक बूस्टर टीका दिया जाता है, जो की स्कूल जाने तक या उस से पहले दिए जाने वाले कुल ४ टीको में होता है। कुछ देशों में, किशोरावस्था के दौरान एक पांचवा टीकाकरण दिया जाता है। विकसित देशों में वयस्कों (18 साल और उससे बड़ी आयु) का नियमित टीकाकरण न तो ज़रूरी है और न ही इसकी सलाह दी जाती है क्योकि ज्यादातर व्यस्क या तो पहले से ही उन्मुक्त हैं या फिर जंगली पोलियो विषाणु के प्रति उनकी अरक्षितता का जोखिम बहुत कम है।
2002 में, (Pediarix नामक) एक आइपीवी युक्त pentavalent(5 घटक) संयोजन वैक्सीन को संयुक्त राज्य अमेरिका में उपयोग के लिए मंजूरी दे दी गयी . उस वैक्सीन में टिटनेस, डिप्थीरिया, काली खांसी (DTaP)(acellular pertussis) के साथ ही हैपेटाइटिस बी के टीके की एक बाल चिकित्सा खुराक भी शामिल थी। ब्रिटेन में, आइपीवी टीके के साथ टेटनस, डिप्थीरिया, काली खांसी और Haemophilus influenzae टाइप बी टीका, को सम्मिलित किया जाता है। मौजूदा आइपीवी के प्रयोग के दौरान, ९० प्रतिशत से अधिक व्यक्तियों में, निष्क्रिय पोलियो टीका की दो खुराकों के बाद, सभी तीन प्रकार के पोलियोविरुस serotype के विरुद्ध सुरक्षात्मक रोगप्रतिकारक विकसित हो गए, और कम से कम ९९ प्रतिशत अगले तीन खुराकों के बाद पोलियो उन्मुक्त हो गए। आइपीवी द्वारा प्रेरित रोगक्षमता की अवधि, निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, हालांकि खुराको की एक पूरी श्रंखला कई वर्षों के लिए सुरक्षा प्रदान करती है।

मौखिक टीका

ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) एक जीवित-तनु वैक्सीन है, जिसे वायरस को, गैर मानवीय कोशिकाओं से एक उपशरिरिक तापमान पर पारित कर के बनाया जाता है, जिस से वायरल जीनोम में एक सहज परिवर्तन (mutation) उत्पन्न होता है। ओरल पोलियो टीके कई समूहों द्वारा विकसित किया गया है जिनमे से एक अल्बर्ट साबिन के नेतृत्व में था। हिलेरी कोप्रोव्सकी और एच.आर. काक्स द्वारा संचालित अन्य समूहों ने खुद का तनु टिका उपभेद विकसित किया। 1958 में, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने जीवित पोलियो टीकों पर एक विशेष समिति बनायीं. विभिन्न टीकों का ध्यान से मूल्यांकन किया गया की वो पोलियो के प्रति प्रतिरक्षण प्रेरित करने में कितने सक्षम हैं, और साथ ही वे बंदरों में neuropathogenicity की आवृत्ति को कितना कम बनाये रख पाते हैं। इन परिणामों के आधार पर, साबिन उपभेदों को दुनिया भर में वितरण के लिए चुना गया .
तनु साबिन 1 उपभेद को उसके विषमय मूल (Mahoney serotype) से अलग करने वाले 57 nucleotide substitutions  हैं, जिनमें से दो साबिन २ उपभेद को तनु करते हैं, और 10 substitutions साबिन 3 उपभेद को तनु करने से सम्बद्ध हैं। सभी ३ साबिन टीकों का समान मूलभूत तनु कारक एक परिवर्तन (mutation) है जो की वायरस के आतंरिक ribosome प्रविष्टि स्थल (या IRES) में स्थित होता है और जो स्टेम परिपथ की संरचना बदल देता है, पोलियो वायरस की, उसके RNA सांचे (template) को मेजबान कोशिका के भीतर अनुदित होने की क्षमता, को कम कर देता है। साबिन वैक्सीन में मौजूद तनु पोलियो वायरस आंत में बहुत कुशलतापूर्वक प्रतिकृति (replicate) बनाता है, जो की संक्रमण और प्रतिकृति (replication) का मूल स्थल है, लेकिन यह तंत्रिका प्रणाली ऊतक के भीतर कुशलतापूर्वक प्रतिकृति  बनाने में असमर्थ है। ओपीवी दवा लेने में भी बेहतर साबित हुई, क्योंकि इसमें जीवाणुहीन सिरिंजों की आवश्यकता नहीं होती है और इस प्रकार यह टीका अधिक व्यापक टीकाकरण अभियानों के लिए उपयुक्त है। ओपीवी टीका सॉल्क वैक्सीन से अधिक समय तक टिकाऊ उन्मुक्ति उपलब्ध करवाती है।
1961 में, प्रकार 1 और 2 monovalent (एकल घटक) मौखिक पोलियोवायरस टीके (MOPV), को लाइसेंस दिया गया था और 1962 में, प्रकार 3 MOPV को लाइसेंस दिया गया था। 1963 में, त्रिसंयोजक ओपीवी (TOPV), को लाइसेंस दिया गया था और संयुक्त राज्य अमेरिका और दुनियाभर की लगभग सभी देशों का, निष्क्रिय पोलियो टीके की जगह यह चुनिन्दा विकल्प बन गया था। बड़े पैमाने पर टीकाकरण की एक दूसरी लहर में पोलियो के मामलों की संख्या में नाटकीय गिरावट हुई. 1962 से 1965 के बीच लगभग 100 मिलियन अमेरिकी (उस समय जनसंख्या का लगभग 56%) नागरिकों को साबिन वैक्सीन दिया गया। परिणाम स्वरुप पोलियो के मामलों की संख्या में काफी हद तक कमी आ गयी, यहाँ तक की सालक टीके के इस्तेमाल से काफी कम हुए स्तर से भी कम.
ओपीवी आमतौर पर शीशियों में उपलब्ध होती है, जिनमें टीके की 10-20 खुराक होती है। मौखिक पोलियो वैक्सीन की एकल खुराक (आमतौर पर दो बूँदें) में साबिन 1 (PV1 के खिलाफ प्रभावी) की 1000000 संक्रामक इकाइयां, साबिन 2 उपभेद की 100000 संक्रामक इकाइयां और साबिन 3 की 600, 000 संक्रामक इकाइयां होती हैं। इस टीके में प्रतिजीवाणु (एंटीबायोटिक) की बेहद छोटी मात्र होती है - neomycin और स्ट्रेप्टोमाइसिन - लेकिन परिरक्षक (prservatives) नहीं होते है। ओपीवी की एक खुराक से लगभग ५० प्रतिशत प्राप्तकर्ताओं को सभी तीन प्रकार के पोलियो वायरस serotype प्रकारों से प्रतिरक्षा मिल जाती है। 95% से अधिक प्राप्तकर्ताओं में जीवित तनु ओपीवी की तीन खुराक, सभी तीन प्रकार के पोलियोवायरस के प्रति, सुरक्षात्मक रोग-प्रतिकारक (antibody) उत्पन्न करती है। ओपीवी आँत में उत्कृष्ट उन्मुक्ति उत्पन्न करती है, जो की पोलियो वायरस के प्रवेश का मुख्या स्थल है, इससे उन क्षेत्रों में जंगली पोलियो वायरस का संक्रमण रोकने में मदद मिलती है जहाँ इसका संक्रमण स्थानिक होता है। टीके में उपयोग किया गया जीवित वायरस मल के रास्ते बहार निकल जाता है और इस प्रकार यह समुदाय में फ़ैल सकता है, परिणामस्वरूप जिन व्यक्तियों का सीधे टीकाकरण नहीं हुआ है उनकी भी पोलियो के विरुद्ध सुरक्षा हो जाती है। आइपीवी, ओपीवी से कम जठरांत्र उन्मुक्ति उत्पन्न करता है, और मुख्य रूप से वायरस को तंत्रिका तंत्र में प्रवेश करने से रोकते हुए काम करता है। जिन क्षेत्रों में जंगली पोलियो वायरस नहीं होता है वहाँ, निष्क्रीय पोलियो वैक्सीन के टीके विकल्प होते हैं। पोलियो के उच्च आपतन वाले क्षेत्रों में, जहां प्रभावोत्पादकता और टीके के विषमय स्वरुप में प्रत्यावर्तन के बीच एक अलग तरह का खतरा होता है, वहाँ जीवित टीके का इस्तेमाल किया जाता हैं। वीवित वायरस के परिवहन और भंडारण की बेहद सख्त ज़रूरतें होती हैं, जो की गरम और दूरदराज़ के इलाकों में एक समस्या रहे है। बाकी दुसरे जीवित वायरस टीकों के साथ, ओपीवी द्वारा दीक्षित उन्मुक्ति लगभग आजीवन रहती है।

Iatrogenic (वैक्सीन प्रेरित) पोलियो

मौखिक पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) के बारे में एक प्रमुख मुद्दा है, इसकी खुद को ऐसे स्वरुप में लौटा लेने की विदित क्षमता, जिससे की स्नायविक संक्रमण और पक्षाघात हो सकता है। टीका व्युत्पन्न पोलियो वायरस (VDPV) द्वारा प्रेरित, पक्षाघात सहित, अन्य नैदानिक रोग, जंगली पोलियो वायरस द्वारा प्रेरित रोगों से अविभेद्य हैं। हालाँकि इसे एक दुर्लभ घटना माना जाता है, वैक्सीन से जुड़े पक्षाघाती पोलियोमाइलिटिस (VAPP) के प्रकोप को दर्ज किया गया है, और यह निम्न ओपीवी कवरेज वाले क्षेत्रों में प्रवृत्त होता है, सम्भवतः क्योकि ओपीवी स्वयं सम्बंधित  प्रकोप के प्रति सुरक्षात्मक है। 
जैसे जैसे जंगली पोलियो की घटनाएं कम हो रही हैं, अनेक देश मौखिक टीके के इस्तेमाल से इंजेक्शन टीके की तरफ लौट रहे हैं, क्योकि ओपीवी से उत्पन्न iatrogenic पोलियो (VAPP) का प्रत्यक्ष खतरा ओपीवी के प्रारंभिक संचरण के अप्रत्याशित लाभ से ज्यादा महत्वपूर्ण है। आई पी वी के इस्तेमाल से परावर्तन मुमकिन नहीं है लेकिन परावर्तित ओपीवी या जंगली पोलियो विषाणु से अरक्षितता होने पर नैदानिक संक्रमण का थोडा जोखिम बना रहता है। मध्य 1950 के दशक में पोलियो टीके के व्यापक उपयोग के बाद कई औद्योगिक देशों में पोलियो की घटनाओं में तेजी से गिरावट आई है। 2000 में संयुक्त राज्य अमेरिका में ओपीवी का इस्तेमाल बंद कर दिया गया और 2004 में ब्रिटेन में भी इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया है, लेकिन दुनिया भर में इसका इस्तेमाल जारी है।
VAPP (टीका सम्बंधित पक्षघाती पोलियो) की दर क्षेत्र विशेष के साथ साथ बदलती रहती है, लेकिन आमतौर पर यह प्रति ७५०,००० टीका प्राप्तकर्ताओं में से एक की है। VAPP के बच्चों की तुलना में वयस्कों में होने की संभावना अधिक है। प्रतिरक्षाहीन (immunodeficient) बच्चों में VAPP होने का जोखिम लगभग 7,000 गुना ज्यादा होता है, विशेषकर बी lymphocyte विकारों (जैसे की agammaglobulinemia और hypogammaglobulinemia) वाले व्यक्तियों में, जिनसे की सुरक्षात्मक रोग्प्रतिकारकों का संस्लेषण कम हो जाता हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है की टीका व्युत्पन्न पोलियो के जोखिम की तुलना में टीकाकरण के फायदों का पलड़ा काफी भारी है। टीका व्युत्पन्न पोलियो के प्रकोप को उच्च गुणवत्ता वाले टीकाकरण के कईं दौर के द्वारा रोका गया है, ताकि पूरी जनसंख्या को प्रतिरक्षित किया जा सके.
VAPP ka प्रकोप स्वतंत्र रूप से बेलारूस (1965-1966), कनाडा (1966-1968), मिस्र (1983-१९९३),Hispaniola(2000-2001), फिलीपींस (2001), मेडागास्कर (2001-2002), और हैती (2002) में हुआ, जहां राजनीतिक संघर्ष और गरीबी ने टीकाकरण के प्रयासों में दखल दिया. 2006 में चीन में वैक्सीन व्युत्पन्न पोलियो वायरस फैला. कंबोडिया (2005-2006), म्यांमार (2006 -2007), इरान (1995 -2007), सीरिया, कुवैत और मिस्र में भी मामले दर्ज किये गए। 2005 के बाद से, विश्व स्वास्थ्य संगठनउत्तरी नाइजीरिया में जीवित मौखिक पोलियो टीके में उत्परिवर्तन के कारण हुए टीका व्युत्पन्न पोलियो पर नज़र रख रहा है।

संदूषण से जुड़े मुद्ददे

1960 में, यह पता चला की रेसस बंदर गुर्दे की कोशिकाएं, जिनका इस्तेमाल कर पोलियो टीके बनाये गए थे, SV40 वायरस (सिमीयन वायरस-४०) से संक्रमित हैं। SV40 की खोज भी 1960 में हुई थी और यह प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाला वायरस है जो की बंदरों को संक्रमित करता है। 1961 में पता चला की SV40 कृंतक प्राणियों में ट्यूमर उत्पन्न करता है। हाल ही में, यह वायरस मनुष्यों में पाए जाने वाले कैंसर के कुछ रूपों में पाया गया, उदाहरण के लिए मस्तिष्क और हड्डी के ट्यूमर,mesothelioma और non -Hodgkin lymphomake के कुछ प्रकार. हालांकि, यह निर्धारित नहीं हो पाया है की यह कैंसर SV40 द्वारा उत्पन्न किया गया है।
१९५५ से १९६३ के बीच इस्तेमाल हुए injection वाले पोलियो के टीकों (आइपीवी) के स्टॉक में SV40 मौजूद था। यह ओपीवी स्वरुप में मौजूद नहीं था। 98 लाख से अधिक अमेरिकियों को 1955 से 1963 के बीच एक या उससे अधिक पोलियो की खुराक दी गयी, जब वह वैक्सीन एक अनुपात में SV40 से संदूषित था;अंदाज़ा लगाया जाता है की 10 - 30 मिलियन अमेरिकी नागरिकों ने SV40 से संदूषित वैक्सीन की खुराक की खुराक ली थी। बाद में विश्लेषण से जाहिर हुआ की, पूर्व सोवियत गुट द्वारा  १९८० तक उत्पादन किये गए टीके, जिनका सोवियत संघ, चीन, जापान और अनेक अफ़्रीकी देशों में इस्तेमाल हुआ था, संदूषित हो सकते हैं, जिसका मतलब है की कईं सौ मिलियन और अधिक SV40 से अनावृत हुए.
1998 में, राष्ट्रीय कैंसर संस्थान ने एक व्यापक अध्ययन का बीड़ा उठाया, जिसमें संस्थानों के SEER डेटाबेस में मौजूद कैंसर की जानकारी का उपयोग किया गया। अध्ययन के प्रकाशित निष्कर्षों से पता चला कि SV40 सम्मिलित टीका लेने वाले लोगों में कैंसर की घटनाओं में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। स्वीडन में किये गए एक अन्य व्यापक अध्ययन में 700,००० व्यक्तियों, जिन्होंने १९५७ तक भी संभवतः संदूषित पोलियो वैक्सीन ग्रहण की थी, में कैंसर दरों की पड़ताल की;इस अध्ययन से फिर पता चला की SV40 सम्मिलित पोलियो टीके वाले व्यक्तियों में उसे न लेने वाले व्यक्तियों की तुलना में कैंसर की आवृति में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। SV40 मनुष्यों में कैंसर का कारण बनता है या नहीं, ये सवाल आज भी विवादास्पद है और इसे सुलझाने के लिए मानव उतकों में SV40 का पता लगाने की बेहतर परख की आवश्यकता है।
मौखिक पोलियो वैक्सीन के विकास की प्रतिद्वंद्विता के दौरान व्यापक पैमाने पर मानवीय परिक्षण किये गए। 1958 तक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने निर्धारित किया कि साबिन उपभेदों का उपयोग कर बनाये गए ओपीवी सबसे सुरक्षित थे। हालांकि,1957 और 1960 के बीच, हिलेरी कोप्रोव्सकी ने दुनिया भर अपने टीके को प्रयोग में लेना जारी रखा. अफ्रीका में, बेल्जियम के प्रान्तों में  लगभग १ मिलियन लोगों  को यह टीके दिए, जो आज के कांगो के लोकतांत्रिक गणराज्य, रवांडा और बुरुंडी हैं। इन मानव परीक्षणों के परिणाम विवादास्पद है, और १९९० के आरोपों ने यह बात खड़ी कर दी की इस टीके ने चिम्पांजी से मानवों में SIV के संचरण के लिए आवश्यक परिस्थितियों  का निर्माण किया है, जिसके कारण एचआईवी / एड्स हो जाता है। हालांकि इस अवधारणा का खंडन किया गया है। 2004 तक, अफ्रीका में पोलियो के मामले, अन्यत्र छिटपुट मामलों के साथ, महाद्वीप के पश्चिमी भाग के बहुत थोड़े से  अलग थलग क्षेत्रों तक ही सीमित कर दिए गए . हालांकि, हाल ही में टीकाकरण अभियानों के प्रति विरोध विकसित हुआ है, अक्सर जिसका सम्बन्ध इस डर से होता है की इन टीको से बांझपन उत्पन्न होता है। उसके बाद से ही नाइजीरिया और कई अन्य अफ्रीकी देशों में यह रोग फिर से उठ खड़ा हुआ है, जो की महामारी-विज्ञानियों के अनुसार कुछ निश्चित स्थानीय आबादी द्वारा अपने बच्चों के टीकाकरण को अस्वीकार करने के कारण हुआ है।

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